रविवार, 26 फ़रवरी 2023

अपने वाला आदमी

 

वह सभी के काम आता था। किसी की भी कोई भी परेशानी हो दौड़ जाता था। हर समस्‍या में आगे रह कर समाधान करने का शौक था। वह सभी को अपने वाला आदमी समझता था। लोग उसकी इस बेवकुफी कहें या सज्‍जनता का भरपूर लाभ लेते थे। उसका नाम समाज में देवता पुरूष था, लेकिन वह ऐसा देवता था जो सिर्फ वरदान देने का काम करता था। उसकी कोई आराधना तब तक ही करता था, जब तक कि उससे काम हो, लेकिन वह इस बात को नहीं मानता था। निष्‍काम भाव से सभी की पीड़ा में सहयोगी बन कर सामने आ जाता था। उसके रहने मात्र के प्रभाव से लोगों की समस्‍याओं का समाधान हो जाता था। वह यही समझता था कि किसी का सहयोग करने से जरूरत पर उसके सहयोग के लिए इतने हाथ होंगे कि गिनती कम पड़ जाएगी। हांलाकि वह भगवान से प्रतिदिन यही मांगता था कि उसका और उसके अपने वालों का जीवन बाधा रहित हो तथा कभी किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़े।
जब से समाज सभ्‍य हुआ या सभ्‍यता का चौला ओढ़ कर समाज घूम रहा है तब से बिना किसी की मदद के कोई भी जीवन नहीं जी सकता है। चाहे कितना ही आत्‍मनिर्भर होने का दंभ भरे लेकिन कहीं न कहीं दूसरे की सहायता की जरूरत पड़ ही जाती है। जो व्‍यक्ति सभी की छोटी-बड़ी जरूरत में मदद करता है, उसको कभी कोई छोटी जरूरत कम ही पड़ती है, लेकिन जब भी पड़ती है, उसका विश्‍वास तोड़ने के लिए काफी होती है। वह मौके पर अपनी मदद नहीं करने वाले के बहानों को उनकी मजबूरी समझ कर माफ कर देता था, यही उसकी गलती थी। उसके मन में परायेपन का भाव कभी आया ही नहीं वह हमेशा सभी को अपना ही समझता रहा। समस्‍या का समाधान करने वाले को कोई समस्‍या नहीं आए और वह बिना मदद हल हो जाए यह संभव नहीं है।
काम तो एक दूसरे से पड़ते ही रहते हैं, लेकिन वक्‍त पर काम आने वाले बिरले ही होते हैं। मौत के बाद मातमपूर्सी पर आने वालों की संख्‍या जरूरत में काम आने वालों की संख्‍या से हमेशा कम ही होती है। व्‍यक्ति की हैसियत के हिसाब से समाज में उसका स्‍थान तय होता है। उसने कभी घर, परिवार, बच्‍चों, और समय की परवाह किए बगैर सभी की खुल कर मदद की। उसको मिलने वाले झूठे सम्‍मान से उसके मन में यही विश्‍वास रहा कि सभी अपने लोग है। उसने किसी की भी समस्‍या हल करने के बाद या पहले यह नहीं पूछा कि इसमें उसका क्‍या लाभ होगा। दूर-दूर तक उसकी इस छवि के कायल थे लोग, मिलने पर प्रशंसा करते कि वह नेक इंसान है, लेकिन यह वास्‍तविकता से कोसों दूर का मामला था। सभी उसकी मदद का फायदा लेना चाहते थे, क्‍योंकि मुफ्त में होने वाले लाभ को भला कौन छोड़ना चाहेगा।
समय का पहिया कभी भी एक जैसा नहीं चलता है, वह कभी कभी उल्‍टा भी घूमता है। अब वे अपने पद पर नहीं रहे। सेवाकाल पूर्ण हो चुका था, सभी ने बड़े जोर-शोर से विदाई कर घर तक पहुँचाने का काम अच्‍छे से किया था। कुछ समय बाद उनको अपने काम से ऑफिस जाने का अवसर मिला। उनको बड़ा गुमान था सब अपने वाले ही है, चुटकियों में काम हो जाएगा। बदलते समय का एहसास नहीं था। वह ऑफिसर जिसके सैकड़ों काम विश्‍वास पर किए थे, वह आज बैठने के लिए कुर्सी तक नहीं दे रहा था। वह मातहत जो कल तक खड़ा रहता था आज टेबल पर पैर रख कर बैठा था और बोल रहा था काम तो हो जाएगा, लेकिन मेरी दक्षिणा का क्‍या होगा। आज उनके विश्‍वास को उन्‍होने घायल अवस्‍था में तड़पते देखा था, जिन्‍हें वे अपने वाला समझ कर सारे काम बिना कुछ पाने की उम्‍मीद में करते थे, वह अपने वाले भी पराए ही निकले। उन्‍हें एहसास हो गया था कि वह मान-सम्‍मान वह झूठा अपनापन, वो प्रशंसाएं सारी पद की थी। अब वे किसी काम के रहे नहीं तो उनके काम कौन आएगा।

              -संजय भट्ट

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Very nice

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