(संजय भट्ट)
सड़क चलते गिरा ही तो था, लेकिन चोंट सिर में लगी। किसी पत्थर ने जैसे घांव ही कर दिया था। सड़क पर सबको चलना था, इसलिए उसे कैसे गलत कहते, सभी उस पत्थर को ही जिम्मेदार ठहरा रहे थे। घांव भरने को होता और कोई न कोई उसे फिर से कुरेद देता, कहीं दीवार तो कभी दरवाजे की रगड़ से घाव हरा ही रहा। अब घाव भर नही रहा था तो उसमे बहने वाला खून बाहर से तो खून ही दिख रहा था, लेकिन अंदर से वह घाव गहराता ही जा रहा था। उस घाव में मवाद भर गया था। लगातार मवाद की स्थिति को देख उसे भी अपने आप से घिन्न सी आने लगी थी। उसको अपने ही शरीर के सिर जैसे हिस्से से बदबू आने लगी थी। लगातार की गई पट्टियों का भी असर अब नहीं हो रहा था, दवाएं सारी बेअसर हो चली थी। सभी को लगने लगा था कि उसे अब मरना पड़ेगा, लेकिन मौत भी यॅंू नहीं आती। जब तक सड़न, बदबू, मवाद और उसके रिसने का कष्ट लिखा होता है, वह होता है। उनके सिर की भी ऐसी ही हालत हो चली थी।
लगातार रिसते मवाद के कारण उनसे सभी ने दूरियां बनाना चालू कर दिया था, लेकिन वह उनकी मॉं थी, कैसे दूर रहती? वह उनका घर था कैसे निकाल कर बाहर कर देता? लेकिन अब तो वह खुद भी अपने आप से परेशान हो चले थे। हर किसी ने उनका मजाक बनाना शुरू कर दिया था। कुछ उन्हें विवादित तो कुछ संवेदनशीन मुद्दा कह कर दूरियां बनाने लगे थे। कोई उनके नजदीक भी जाना नहीं चाहता था। उनकी एक छोटी सी चोंट ने उन्हें समाज का अभिन्न अंग होने से रोकने का प्रयास किया था। वे सब के साथ, सबके पास रहना चाहते थे, लेकिन उनकी चोंट और उससे रिसता मवाद उनके लिए अभिशाप बन गया था। अब सिर का मामला था तो कोई भी रिस्क लेने से डर रहा था, लेकिन उनके पिता ने हिम्मत दिखाई और डॉक्टर को पूर्ण इजाजत दे दी कि जो भी खर्च लगे, जो भी संसाधन लगे, लेकिन उनके सिर से रिसता मवाद बंद होना चाहिए।
डॉक्टर भी हद दर्जे के कलाकार थे, उन्होंने कुछ दिनों तक ऐसी पट्टी की कि सभी लगने लगा कि सब ठीक हो रहा है। अच्छा दिख रहा है, लेकिन मवाद तो अंदर भी फैला था, उसे रोकने में डॉक्टर भी नाकामयाब रहे, कैंसर का आकार ले लिया था, उस छोटी सी चोंट ने। समय बीतता गया, लोग घाव कुरेदते गए, अब कैंसर तो उन्हें ही भुगतना था या उनके परिवार को फर्क पड़ा था, किसी को कुछ विशेष नहीं था।
एक मामूली सी चोंट का इतना बड़ा असर होगा किसी ने ये सोंचा नहीं था, लेकिन अब हो गया था। पहले खून को रोकने का इलाज होना था, लेकिन सभी ने घांव का इलाज किया, उनको चलने में ध्यान रखना था,लेकिन सभी ने पत्थर हो दोष दिया। बस ऐसी ही कुछ छोटी बातों से बड़ा मामला होता गया और मवाद अब भी रिस रहा है। कोई न कोई उनके जख्मों हो फिर से हरा कर देता है। जब भी घाव पर हाथ रखा जाता है, मवाद रिसने लगता है। अब उनका घाव और रिसता हुआ मवाद मुद्दा बन गया है। सब उस पत्थर को तलाश कर रहे हैं, जिसने इतना गहरा जख्म दिया है, लेकिन कोई यह नहीं कर रहा कि उनकी बीमारी को पहचाने, मवाद को फैलने से रोके, जख्म को कुरेदने के स्थान पर मरहम पर जोर दे और उन्हें फिर से वादियों में घूमने के लिए खुला छोड़ दें। जहां से केसर की महक और गुलाबों सा एहसास मिले।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
Very nice