लड़ाई के लड्डू
(संजय भट्ट) कभी विचार भी किया है कि लड़ाई में भी लड्डू बंटते हैं। वैसे तो लड्डू की प्रकृति मीठी होती है, लेकिन लड़ाई में बंटने वाला यह लड्डू कड़वा, कसैला और बेस्वाद होता है। यह लड्डू दूसरों के चाले (बहकावे) में आकर खाया जाता है। क्योंकि सबको पता होता है कि लड्डू मीठा होता है तो खा भी लेते हैं, लेकिन खाने के बाद जो दुर्गति होती है, उससे सिर्फ मॉं दुर्गा ही बचा सकती है। यह लड्डू खाने के लिए प्रेरित करने वालों का भी एक दल हुआ करता है, जो इतनी गज़ब की प्रेरणा देता है कि आप जैसे ना चाहते हुए भी शादी कर लेते हैं, वैसे ही यह लड़ाई का लड्डू गटकने को तैयार हो जाते हैं। बात बरसों पुरानी है, मेरे परदादा और मेरे पड़ौसी भाई के परदादा एक हुआ करते थे, मतलब कहने का यह कि वह मेरे दूर के रिश्ते में भाई ही है। लेकिन वह उसके पास अच्छी खेती होने के कारण लोगों की निगाहें लगी रहती थी। खेती मेरे पास भी कमजोर नहीं लेकिन मेरी अच्छी स्थिति के कारण लोगों को जलन की भावना है। कुछ लोगों ने मिलकर उसको भड़का दिया। अब वह कुछ छिछोरी हरकतें करने लगा। मसलन मेरे घर के सामने गंदा पानी ढोल देना, कचरा फैंक कर चले जाना, गाय और कुत्ते की रोटी मेरे आंगन में फैंक कर चले जाना। बहुत दिनों तक मैंने परिवार का मामला सोंच कर टाल दिया। लगातार हरकतों को छिछोरी मान कर इग्नोर करो तो लोग समझने लगते हैं कि मुझसे डरता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही होने लगा था। मैं घर को लौट रहा था तो उसके साथ भड़काने वाले लोगों ने मिलकर मुझे घेर लिया। हांलाकि उनका कोई उद्देश्य नहीं था। बस मुझे छेड़ने के लिए इस तरह की हरकत की। मैंने इसको भी आदत के अनुसार इग्नोर कर दिया। हमारे घर में शुरू से ही हम सभी मिलकर बैठ कर रात का भोजन साथ ही करते हैं और दिनभर की चर्चा भी कर लेते हैं। इसी उधेड़बुन में न चाहते हुए भी मॅुह से निकल गया कि आज कुछ लोगों ने घेरने का प्रयास किया, यह बात मेरे कहने से पहले ही परिवार और गांव वालों को भी पता चल गई थी। घर में सभी का खून उबाल पर था, लेकिन मैं शांत ही रहा। अभी भी मानता था कि वह मेरा दूर के रिश्ते में ही सही पर है तो भाई ही। लेकिन वह ऐसा नहीं मानता था, क्योंकि वह चाले लगा हुआ था। सभी को पता था कि वह इतना मजबूत नहीं है कि मेरे से किसी भी तरह का मुकाबला करे, लेकिन फिर भी जो लोगों के चाले लग जाता है, उसका तो भगवान ही मालिक है। उसे उन लोगों की बातों के अलावा रिश्ता, नाता, प्रेमभाव, पुराना सम्बन्ध कुछ भी दिखाई नहीं देता है। कुछ दिन पहले जब उसको चाले लगाने लगाने वालों ने छेड़छाड़ के लिए मुझे कुछ कहा था तो मैंने टाल दिया था, लेकिन मेरे घरवालों को यह बात अखर रही थी। अब बच्चों के सामने मेरी इज्जत का सवाल आ गया था। मैंने भी विचार कर लिया, यह लोगों के चाले लग कर लड़ाई में लड्डू बंटवाने की इच्छा रखता है, तो इसे भी पुरा कर दिया जाए। यह सोंच कर मैं आज घर ही रहा। उसकी आदत के अनुसार छिछोरी हरकतें जारी थी। जैसे ही मेरे आंगन में गाय कुत्तों की रोटी फैंकने के लिए आया। मैंने भी कस कर एक चांटा जड़ दिया। वह भी मार खार घर में बैठने वाला तो था नहीं, उसने भी हाथ उठाया, लेकिन मैंने उसे पटक दिया। अब उसने आने घर में दौड़ लगाई और पहले उसको चाले लगाने वालों को बुलवाने की कोशिश की। सभी ने हाथ खड़े कर दिए। अब घर का परिवार का मामला बताने लगे। मुझे भी समझाने लगे कि मारपीट अच्छी बात नहीं है। तुम मारपीट करोगे तो हम तुम्हारा माल मंडी में बिकवाली से रोक देंगे। मेरी फितरत दूसरी है, एक बार लड़ाई में कूद गया तो फिर आर या पार किसी की परवाह नहीं करता। उसका पुरा परिवार सामने आ गया, लड़ने के लिए लेकिन मैंने भी बड़े बुजुर्गों को छोड़ कर बाकी सब को पीट दिया। अब उसे लगने लगा था कि लड़ाई का जो लड्डू होता है वह किसी के भी चाले लग कर नहीं खाना चाहिए, नहीं तो पुरे मॅुह का स्वाद बिगड़ जाता है। कड़वा और कसैला हो जाता है, लेकिन यह लड्डू ही ऐसे हैं। एक बार बंटना चालू होते हैं तो पता नहीं क्या-क्या तहस नहस कर देते हैं। जो उकसाने वाले है, या कहें चाले लगाने वाले हैं, वह सभी लड्डू बंटने की स्थिति में भाग जाते हैं और यह लड्डू अकेले ही खाना पड़ता है। | |
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Very nice