संजय भट्ट
एक ये थे और एक वो ये को काम के आगे फुरसत नहीं थी और वो को फुरसत के सिवाय कोई काम नहीं था। दोनों एक दूसरे से जलन रखते थे। ये सोंचते देखो इसे कितनी फुरसत है और वो सोंचता काश मेरे पास भी कोई काम होता। दिनभर मारा मारा फिरता हँ काम की तलाश में और ये है कि काम से इतना भी समय नहीं अपने परिवार के साथ समय बीता सके। दोनों ही काम को लेकर ताने सुनते'सुनते थक गए थे। ये अपने बॉस से काम पुरा नहीं होने का ताना सुनता था तो वो समाज का कि कुछ करता क्यों नहीं। दोनों की अच्छी बात यह थी कि दोनों एक ही परिवार के सदस्य थे और बाप की कमाई होने के कारण दोनों को तकलीफ नहीं थी।
लगातार काम के ताने सुनकर यह दोनों परेशान थे। फुरसतिया वो कभी सो कर तो कभी इधर-उधर घूम कर अपना समय बीताता था तो ये दिनभर अपने काम में इतना मशरूफ रहता था कि उसे सोने का समय कभी-कभी ही मिल पाता था। ये जब घर आता तो वो को सोया देख बड़ी जलन का अनुभव करता था, लेकिन दरअसल उसे वो से काफी सहायता मिलती थी। वो फुरसत में था तो घरेलू सामान, सब्जी आदि लाने से लेकर सारा काम कर लेता था। उसे बाजार का अच्छा खासा अनुभव हो गया था,लेकिन ये को पता ही नहीं था कि आटा-दाल का क्या भाव है।
ऐसा नहीं कि पारिवारिक काम करना कोई काम नहीं है, लेकिन समाज और ये जैसे लोग सिर्फ कमाई के काम को ही काम समझते हैं। ये और वो जैसे कई परिवार हमारे समाज में बिखरे पड़े हैं। दोनों की अपनी एहमियत है, लेकिन ये जैसे लोगों तथा समाज का मानना है कि लड़का है तो उसे कोई कमाई का काम करना चाहिए। इसी धारणा के कारण ही ये के दो बच्चे थे लेकिन वो की उमर होने के बाद भी उसका विवाह नहीं हो रहा था। मामला बस यहीं अटक जाता कि लड़का करता क्या है। जैसे उसका घर में काम करना कोई काम ही नहीं हो। वो अगर नहीं हो तो ये को इतनी परेशानी आ जाए कि घर बाहर काम करते-करते वह थक जाए।
दरअसल काम नहीं होने के कारण उसकी समाज तथा घर में कोई वैल्यु ही नहीं समझता था। लेकिन जब कभी घर का कोई भी काम हो समाज में कहीं आना-जाना हो ये को फुरसत नहीं थी, जबकि फुरसत में होने के कारण यह सारी जिम्मेदारी वो को ही निभाना पड़ती थी। समाज के ज्यादातर लोग यही समझते कि वो ही उनके परिवार में है। इस मामले में ये की कोई पहचान नहीं है। समाज के रिश्ते नाते निभाना तथा और आना-जाना भी एक परम्परा है, लेकिन ये को काम के आगे फुरसत नहीं होने के कारण वह चाह कर भी नहीं आ-जा पाता था। यहां तक कि उसके ससुराल में कोई काम होता तो भी पत्नी या तो अकेले या वो के साथ ही जा पाती थी।
दोनों का अपना दुख था, लेकिन अब वो को इस आने जाने से भी कोफ्त होने लगी थी, क्योंकि सभी का एक ही सवाल होता था क्या काम करते हो। वह मजाकिया होने का ढोंग करते हुए कह देता था काम की तलाश। सभी उसकी इस बात पर ठहाका मार देते थे, लेकिन यही ठहाके उसको अन्दर तक झकझोर देते थे। वह खुद से ही सवाल करता क्या घर परिवार की देखभाल करना, पारिवारिक रिश्ते नातों को निभाना तथा पारंपरिक व्यवहार में शामिल होना कोई काम नहीं है। लेकिन इसका कोई उत्तर उसे नहीं मिल पा रहा था।
समाज की मानसिकता से परेशान वह काम और कमाई के चक्कर में खुद ही पिसता चला जा रहा था। सभी जानते थे कि ये और वो में उमर का कितना अंतर है। समय के कारण ये को बिना किसी हुनर के आसानी से एक दफ्तर में काम मिल गया, लेकिन वो का समय आया तो काफी सारी योग्यताओं के बाद भी उसके तकदीर में मारे-मारे भटकना ही लिखा था। ये चार पैसे कमाता है तो घर में परिवार में उसकी अलग इमेज है और वो घर का इतना सारा काम करता है, हर किसी की मदद को तैयार रहता है तो उसकी कोई इज्जत ही नहीं करता।
दरअसल सारा खेल धन माया का है। लक्ष्मी जिस पर मेहरबान है सब उसकी पूजा करते हैं,लेकिन घर में दिनभर पिसते रहने वालों को कोई नहीं पूछता है। सब कुछ छोड़कर वो ने अपना खुद का काम शुरू करने की ठानी, लेकिन किस्मत का भी अपना रोल हुआ करता है। घाटे के कारण छोटी-सी परचुनी दुकान भी ऑनलाइन खरीदी के इस दौर में फेल हो गई। वो पढ़ाई में ये से कई गुना तेज और आगे था, हरबार टॉप करने के बाद भी उसके पास एदद काम की कमी थी।
यह सब समय का चक्र था कि अब ये और वो के सिर से पिता का साया उठ गया। अब ये के पास काम था, पैसा था और इसी पैसे की इज्जत थी, लेकिन वो को अब एहसास होने लगा था वह वास्तविक अनाथ हो गया है। जिसके पास कोई काम नहीं उसकी समाज और परिवार में कोई एहमियत नहीं। अभी तक बाप कमाई पर घरेलू काम देखने और दो वक्त की रोटियों का इंतजाम मुफ्त में करने वाले वो के ताने बढ़ थे। पिता की मातमपुर्सी के लिए जो भी आता उसे सिर्फ वो ही दिखता था, ये तो बस एक दिन पिता की मौत पर रूका और दूसरे ही दिन उठावना होते ही काम पर चला गया। यहां सभी वो को देखते और वो सभी को काम की निगाह से।
सुखद
जवाब देंहटाएं