(संजय भट्ट)
क्या आपने कभी सोंचा है कि संबंधों के विभिन्न स्वरूप होते हैं। यह कई तरह के रंगों और स्वादों में भी उपलब्ध है। इन दिनों संबंध भारी और हल्के भी होने लगे हैं। समझ नहीं आ रहा है कि यह संबंध है या कोई मायावी जो अपना मनचाहा स्वरूप धारण कर लेता है? सुना था गिरगिट रंग बदलने में माहिर होता है, यह मौका देख कर अपना रंग बदल लेता है, लेकिन ऐसा वह अपनी जान बचाने के लिए करता है और यह कुदरत ने उसे कॉपीराइट करके दिया है। फिर भी सम्बन्ध का पता नहीं यह कैसे इतने स्वरूपों में सामने आने लगा।
अभी कल ही की बात है, वह चर्चा में कह रहे थे-उनके और हमारे संबंध बहुत गहरे हैं कभी भी किसी भी काम में मना नहीं कर सकते, लेकिन देखा है अक्सर उनको इनके बारे में बतियाते हुए। वह हमेशा कहते हैं, यार बहुत ही घटिया आदमी है हमेशा कोई-न-कोई डिमांड चलती ही रहती है। मैंने अंदाजा लगाया वह भले ही इन संबंधों को गहरा मानते हो यह हमेशा ही उन्हें हल्के में लेते हैं। कई दिनों बाद मिले तो फिर उनके संबंधों का नया स्वरूप सामने आया। कहने लगे- अब वे ऐसे नहीं रहे। उनके और हमारे संबंधों में खटास आ गई है, मैने भी चुहलबाजी के लिए पूछ लिया दही वाली या इमली वाली? झल्ला के बोल पड़े ऐसा बोल कर आप अपने संबंधो में कड़वाहट पैदा मत करो यार। मैने भी कह दिया हमारे संबंधों की मिठास कभी कम नहीं हो सकती है। हम चाहे जितना लड़े-झगड़े टांट करें या छेड़खानी आखिर हमारे संबंध काफी पुराने है। बातों-बातों में संबंधों के इतिहास का भी पता चला यह नए और पुराने दोनों तरीकों के होते हैं। फिर छेड़ने के लिए पूछा कल तक तो आपके और उनके संबंध बहुत गहरे थे, आज क्या हुआ? वे फिर टूटते दिल को थामते हुए बोले- हल्के लोगों से गहरे संबंध नहीं रखना चाहिए, उनको घमण्ड आ गया है। वे अपना रंग दिखाने लगे हैं, इसीलिए संबंध अब इतने गहरे नहीं रहे। संबंधों में दूरियां और नजदीकियां भी होती है। कुछ दूर के होकर भी अपने होते हैं और अपने होकर भी दूर ही रह जाते हैं।
गिरगिट की तरह बदलते स्वरूपों को देख कर मैं दंग रह गया। यह कैसा संबंध है जो हर बार बदल जाता है। संबंध अंतरंग और बाहरी भी होता है। अंतरंग संबंध में किसी को कुछ पता नहीं चलता,लेकिन बाहरी संबंध के बारे में सभी को पता चल जाता है। बाहरी संबंध सिर्फ दिखावे के होते हैं और मौके पर काम नही आते, लेकिन अंतरंग संबंध बेहद अंदर तक होते हैं और जब इनका खुलासा होता है तो अच्छे-अच्छों की चूलें हिल जाती है। अक्सर अंतरंग संबंधों को लेकर खूब बाते भी बनाई जाती है। कई लोगों को तो अंतरंग संबंध रास भी नहीं आते,यह लोगों के बीच विवाद का कारण भी बन जाते हैं।
संबंधों में मिट्टी वाला भी गुण होता है यह टूट कर बिखर भी जाते हैं और फिर से जुड़ भी जाते हैं। काफी शोध के बाद पता चल पाया कि संबंधों के कई प्रकार होते हैं, यह वक्त, जरूरत और मौका देख कर अपना स्वरूप बदल लेते हैं। मौका आने पर संबंधों में गधे को भी बाप का दर्जा देना पड़ता है और मौका निकल जाने पर पलटा कर लात भी। बुरा वक्त हो तो किसी से संबंध अच्छे नहीं होते और अच्छे वक्त में हर कोई आप से संबंध बनाना चाहता है। ठीक यही फार्मूला जरूरत के समय भी होता है। आपकी जरूरत हो तो कोई संबंध काम नहीं आता और अपनी जरूरत के लिए हर कोई अपने संबंध निभाने चला आता है। संबंधों की आड़ में क्या-क्या नहीं होता? आपको महान बता दिया जाता है और आपको सबसे घटिया बता दिया जाता है। वैसे संबंध में मिट्टी वाला गुण है तो निश्चित ही इसमें जड़े भी निकल आती होगी। कहा भी जाता है, संबंधों की जड़ें गहरी होती है। पर पता नहीं चलता कब संबंधों की जड़ में दीमक लग जाती है, कब कोई दही उड़ेल कर खटास पैदा कर देता है और कब संबंध टूट कर बिखर जाते हैं। खटास कब कड़वाहट में बदल जाती है और मिठास वाले संबंध में नजदीकियों में कब दूरियां आ जाती है। इसलिए जब संबंध बनाओं तो संबंध में सारे गुणों-अवगुणों को पहचान कर इसको फौलाद की तरह मजबूत और उसी लोहे से बने तार की तरह लचीला रखो, नहीं तो यह संबंध कब अपना कौन-सा स्वरूप दिखा दें कह नहीं सकते।
बहुत अच्छा लगा
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