मंगलवार, 31 जनवरी 2023

आर्टिफिशल जिन्दगी

    -संजय भट्ट

जमाना लगातार बदल रहा है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और व्‍यवहारिक हर तरीके से बदलाव देखा जा रहा है। इस बदलाव के दौर में कुछ भी ऑरिजनल नहीं रहा। सब कुछ आर्टिफिशल होता जा रहा है। महिलाओं को गहनों से बहुत लगाव होता है, लेकिन यहां भी सोने-चांदी की जगह आर्टिफिशल ऑर्नामेन्‍ट ने अपना जो स्‍थान बनाया है वह ऑरिजनल को कहीं पीछे छोड़ देता है। धीरे-धीरे ही सही लेकिन सब कुछ आर्टिफिशल होता जा रहा है। समाज में रिश्‍ते भी होते थे, लेकिन मनचाहे जीवन साथी की तलाश में मॉ-बाप को छोड़ कर कोई रिश्‍ता ऑरिजनल नहीं रहा, जिसे निभाया जा रहा हो। सारे रिश्‍तों में गहनों की तरह ही आर्टिफिशल का महत्‍व बढ़ गया है। समाज भी आर्टिफिशल की ओर इतना आकर्षित है कि ऑरिजनलिटी लुप्‍त ही होती जा रही है। अब तो प्‍यार की प्‍यास में अपने महत्‍व को प्रतिपादित करने के लिए माता-पिता का रिश्‍ता भी अपनी मौलिकता से बाहर आ गया है। दिखावे के प्रचलन ने सारी मौलिकता समाप्‍त कर आर्टिफिशल को स्‍थान देना शुरू कर दिया है। हजारों किलोमीटर की दूरी पर बैठा फेसबुक मित्र घर परिवार के ऑरिनल रिश्‍ते से ऊपर हो गया है।
समाज बदलता है तो वह निश्चित ही विकास के पथ पर आगे बढ़ता है। क्‍योंकि कहा भी गया है, परिवर्तन सदैव जीवन को प्रेरणा देता है, लेकिन यह कैसा बदलाव हो रहा है। हर कोई बदल रहा है। जमाना भी इस बदलाव को कंप्‍युटर में इंटरनेट की गति से स्‍वीकार करता जा रहा है। सब कुछ बदलाव की बयार में ऐसे बहते जा रहे हैं, जैसे आंधी-तुफान के साथ सूखे पत्‍तों का कांरवा हो। अब कारवां सूखे पत्‍तों का है तो उनमे निश्चित ही हल्‍कापन होगा। उनका पानी भी उतर चुका होगा। इस उतरे हुए पानी के साथ एकदम खुलापन और चकाचौंध से अंधियाई युवा पीढ़ी किसी को कुछ समझने को तैयार नहीं है।
परिवार में रहते हैं, खाते हैं, पीते हैं, घर में सोते हैं, लेकिन घर का उपयोग मकान या धर्मशाला की तरह ही करते हैं। जहां सब सुविधा तो है, लेकिन कोई अपना नहीं। सब एक दूसरे से ऊपर दिखाने की कोशिश में समन्‍वय की व्‍यवस्‍था से बाहर आ चुके हैं। पिता किसी जमाने में प्रेरणास्रोत और आइडियल हुआ करते थे, लेकिन आज पिता एक ऐसा निरीह प्राणी है, जिसका घर में सिर्फ इसलिए महत्‍व है कि वह कमाता है और अपनों बच्‍चों का पालन-पोषण का कर्तव्‍य निर्वाह करता है। बच्‍चे इसे अपना अधिकार समझते हैं और पिता को एक एटीएम की तरह यूज करते हैं। जब पिता की यह स्थिति है तो बाकी रिश्‍ते तो स्‍वत: ही आर्टिफिशल हो जाएंगे।
अब सारा समाज यूज एण्‍ड थ्रो के सिद्धान्‍त पर काम करता है। थाली कटोरी गिलास की जगह जैसे पत्‍तल, दौने और डिस्‍पोजल ने ले ली है, उसी तरह सारी भावनाएं और व्‍यवहार हो गए हैं। जब तक काम है, वह व्‍यक्ति काम का है, लेकिन जैसे ही काम निकला उसे पहचानते तक नहीं। एहसान नाम की भावना का विलोप हो गया है। फेसबुक, वाट्सएप तथा इंस्‍टाग्राम जैसे सोशल मीडिया के तंत्र पर परिवार के लोगों को ब्‍लॉक कर दूर देशों में बैठे अनजान लोगों से अपनापन बढ़ाने का प्रचलन चल गया है। वो दूर बैठा अनजान शख्‍स हमारी हर हरकत पर तारीफों के पूल बांधता है और हम खुशी से फुले नहीं समाते हैं। पत्‍नी और मॉ के हाथों का स्‍वाद खाने पर पता चलता है, लेकिन फोटो में सजी थाली पर बिना चखे ही सैकड़ों लाइक और डिलिशियस के कमेन्‍ट देख कर खुश होने की परंपरा सी चल पड़ी है।
यही सब समाज में होते देख कंप्‍युटर की दुनिया में भी नया प्रयोग आ गया है। लगातार बदलते समाज और ढब्‍बूपन को कंप्‍युटर ने परख लिया है। अब हमारे मन की बात को भी समझा जाने लगा है। जैसे ही सर्च इंजन में कुछ एक बार सर्च करो वह बार-बार हमारे सामने आने लगता है। कंप्‍युटर और सर्च इंजन को पता करते देर नहीं लगती कि हमारी मंशा क्‍या है। लिखने पढ़ने से कतराने वाले लोगों के लिए यह वरदान माना जा रहा है। एक शब्‍द लिखो और आगे का पुरा मजमुन हमारे सामने आने लगता है। हमारी बुद्धि तक को इस निर्भरता ने समझ लिया है। पहले व्‍यक्ति इं‍टलिजेंट हुआ करते थे, विद्यार्थियों को इसका तमगा उनके शिक्षक देते थे, लेकिन आजकल यह भी आर्टिफिशल हो गया है। इसे आर्टिफिशल इंटलिजेंस का नाम दिया गया है। डर है कहीं आर्टिफिशल जमाने में यह हमारी बुद्धि को ही आर्टिफिशल नहीं बना दे, नहीं तो जमाने में कौन कितना बुद्धिमान है, इसका पता ही नहीं चलेगा।

           

4 टिप्‍पणियां:

Very nice

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